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सीधी-शराब की बोतलों के जिम्मे में यातायात थाना दिन-रात वसूली में व्यस्त यातायात का अमला

सीधी जिलाा अपने कारनामों से आए दिन अपने चर्चा में रहता है लेकिन इस बार चर्चा में सीधी शहर की यातायात व्यवस्था को लेकर है शहर में खुलेआम गाड़ियों की भीड़ सड़क किनारे अव्यवस्थित आवागमन बस इंतजामात की पोल खोलते है खुलेआम शहर में धृतराष्ट्र बनकर जिम्मेदार घूम रहे हैं हालात यह है कि आम आदमी अपने दर्द को भी नहीं बयां कर सकता है बदहाल इंतजामात की ऐसी तस्वीर अमूमन आपको सीधी शहर के हर चौराहे में देखने को मिल जाएगी, जहां सड़क के इर्द-गिर्द अव्यवस्था का आलम जैसे खुद चीख चीख कर कह रहा कि मैं बीमार हूं, डॉक्टर नहीं है, इंतजाम करिए, सांसे कम हो रही आखिर कब मिलेगा सीधी की सड़कों को ऑक्सीजन जब आम आदमी इस सीधी शहर में व्यवस्थित रूप से आवागमन कर सकेगा क्या, जिम्मेदार विभाग केबल और केबल कागजों तक दुरुस्तगीं दिखाकर साहब से अपनी पीठ थपथपावाते रहेंगे या फिर जमीन में उतर कर हालातों को सुधरेंगे, सवाल बेहद बड़ा है की सीधी शहर में। गांव और शहर दोनों का जुड़ाव हैं जहां प्रतिदिन हजारों गाड़ियां शहर की सड़कों से गुजरती है किंतु वह सीधी की इस घटिया तस्वीरों से तकल्लुफ करती है, क्या इन तस्वीरों को सुधारने की जिम्मेदारी किसी और की है या फिर जिम्मेदारों की, आम आदमी चिल्ला चिल्ला कर सड़कें चिल्ला चिल्ला कर अपना दर्द बयां कर रही किंतु यह अंधा, गूंगा बहरा प्रशासन, ना ही सुन रहा है, ना ही समझ रहा है और ना ही देख रहा है इन्हें तो सीधी में रामराज्य ही दिख रहा है जहां सब कंट्रोल में हैं। साहब कभी कुर्सी को भी देख लिया करें कि जो आज कुर्सी में विराजमान है क्या वह उस कुर्सी के लायक है? यहां तो केवल कुर्सी बोतलों के सहारे हैं बोतल खत्म कुर्सी की ताकत खत्म कुछ लोग ऐसे जिम्मेदार हैं जो फिल्मी दुनिया से तालुकात रखना चाहते हैं ना कि दिए गए कामों को बेहतरी से निभाना चाहते हैं यह दुर्भाग्य है सीधी का कि ऐसे व्यक्ति सीधी के आज रहनुमा है, जो केवल और केवल स्वार्थी है ,आखिर कब जागेगा इनमें सेवा भाव, यह तो मेवा और पैसे के इर्द-गिर्द घूमने वाले लोग हैं काश इन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास होता और सीधी बेहतर सीधी होती है ना की सीधी अपनी ही तस्वीर पर रोती नजर आती, पैसे का इतना मोह, शायद आपने मरने वाले के अंदर देखा होगा उससे मोह और माया नहीं छूटती किंतु, सीधी में ऐसे जिम्मेदार हैं जिनकी सरकारी तनख्वाह खातों में रह जाती है और ऊपरी के चक्कर में शहर की सीमा से बाहर जाकर अपना करतब दिखाते हैं जिम्मेदारी शहर की नहीं संभाल रही है और गांव जाकर वसूली चल रही है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हालात सीधी शहर के हैं जिसकी कल्पना दूसरे शहर से आने वाला व्यक्ति ही कर सकता है क्योंकि सीधी शहर के लोगों को ऐसे जीने की आदत हो गई है, कब जागोगे धृतराष्ट्र जागो सीधी को कुरुक्षेत्र ना बना दो अन्याय में कौरवों का साथ ना देकर पांडवों का साथ दीजिए और सीधी के बेहतरी के लिए कुछ प्रयास कीजिए।

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